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हिन्दू देवियों के नाम और परिचय

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हिन्दू देवियों के नाम और परिचय 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ 1.माता सरस्वती (विद्या की देवी ब्रह्मा की पत्नी)। 2.माता सरस्वती (ब्रह्मा-सावित्री की पुत्री)। 3.सावित्री (ब्रह्मा की पत्नी)। 4.गायत्री (ब्रह्मा की पत्नी)। 5.श्रद्धा (ब्रह्मा की पत्नी)। 6.मेधा (ब्रह्मा की पत्नी)। 7. शतरूपा (स्वायंभुव मनु की पत्नी)। 8.अदिति (कश्यप की पत्नी और देवताओं की माता)। 9.श्रद्धा (अंगिरा की पत्नी और बृहस्पति मां)। 10.उषा (द्यौ की पुत्री)। 11.माता लक्ष्मी (भगवान विष्णु की पत्नी)। 12. देवी तुलसी (वृंदा देवी विष्णु का अंश)। 13.विंध्यवासिनी देवी योगमाया (यशोदा की पुत्री एकानंशा, श्रीकृष्ण की बहन)। 14.यमुना देवी (यमराज की बहन कालिंदी)। 15. शचि (इंद्र की पत्नी इंद्राणील ज्वालादेवी की उपासक)। 16. देवी आर्याणि- (पितरों के अधिपति अर्यमा की बहन, अदिति की पुत्री, सूर्यपुत्र रेवंतस की पत्नी हैं)। 17.अम्बिका : (त्रिदेव जननी जगदम्बे, दुर्गा, कैटभा, महामाया और चामुंडा)। 18.सती : (दक्ष प्रजापति की पुत्री, भगवान शंकर की पत्नी)। 19.पार्वती : (राज हिमवान और रानी मैनावती की पुत्री, भगवान शंकर की पत्नी, पु?त्र कार्तिकेय, ग...

पृथ्वीराज चौहान की वीरता, मोहम्मद गोरी का किया था खात्मा

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  पृथ्वीराज (सन् 1178-1192) चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे, जो उत्तर भारत में12 वीं सदी के उत्तरार्ध में अजमेर  और दिल्ली पर राज्य करते थे. आइए जानते हैं उनके बारे में. इतिहास के पन्ने पलटे तो पृथ्वीराज चौहान के बारे में कई जानकारियां हाथ लगेगी. पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1168 में अजमेर के राजा सोमेश्वप चौहान के यहां गुजरात में हुआ था. वह बचपन से ही प्रतिभाशाली बालक थे. जब उनके पिता की मृत्यु हुई तो उन्होंने 13 साल की उम्र में अजमेर के राजगढ़ की गद्दी को संभाला.  पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही एक कुशल योद्धा थे, उन्होने युद्ध के अनेक गुण सीखे थे. उन्होने अपने बाल्य काल में ही योद्धा बनने के सभी गुण सीख लिए थे.  बता दें, पृथ्वीराज के दादा अंगम दिल्ली के शासक थे. उन्होंने पृथ्वी चौहान के साहस और बहादुरी के किस्से सुनने के बाद उन्हें दिल्ली के सिंहासन का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.  बताया जाता है  पृथ्वीराज इतने बलवान थे कि एक बार उन्होंने बिना किसी हथियार के मदद के शेर मार डाला था.  पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली के राज सिंहासन की गद्दी पर विराजने के बाद ही किल...

वीर योद्धा आल्हा और ऊदल

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  आल्हा और ऊदल दो भाई थे। ये बुन्देलखण्ड के महोबा के वीर योद्धा थे। कालिंजर के राजा के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन वीरों की गाथा वर्णित है। इस ग्रंथ में दों वीरों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन है। आखरी लड़ाई उन्होंने पृथ्‍वीराज चौहान के साथ लड़ी थी। मां शारदा माई के भक्त आल्हा आज भी करते हैं मां की पूजा और आरती। जो इस पर विश्वास नहीं करता वे अपनी आंखों से जाकर देख सकता है। आल्हाखण्ड ग्रंथ : आल्हाखण्ड में गाया जाता है कि इन दोनों भाइयों का युद्ध दिल्ली के तत्कालीन शासक पृथ्वीराज चौहान से हुआ था। पृथ्‍वीराज चौहान को युद्ध में हारना पड़ा था लेकिन इसके पश्चात आल्हा के मन में वैराग्य आ गया और उन्होंने संन्यास ले लिया था। कहते हैं कि इस युद्ध में उनका भाई वीरगति को प्राप्त हो गया था। गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया था। पृथ्वीराज चौहान के साथ उनकी यह आखरी लड़ाई थी।मान्यता है कि मां के परम भक्त आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था, लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा था। मां के आदेशानुसार आल्...

डोडिया राजपूत

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डोडिया वंश की उत्पत्ति कदलीवृक्ष के डोडे (पुष्प)से एक साहसी वीर क्षत्रिय पुरूष दीपंग का जन्म हुआ । केले के डोडे पुष्पकली से उत्पन्न होने के कारण दीपंग का वंश डोडिया कहलाया । दीपंग का साम्राज्य विस्तार सौराष्ट्र हिंगलाज काठियिवाड एवं समुद्र तक था ।दीपंग की राजधानी मुल्तान थी । मेवाड़ के इतिहास में सरदारगढ़ ठिकाने के सामन्तो की प्रमुख भूमिका रही है। सरदारगढ़ के स्वामी काठियावाड़ स्थित शार्दुलगढ के सिंह  डोडिया के वंशज एवं ठाकुर इनकी पदवी थी मेवाड़ के वैदेशिक सरदार जो  अन्य प्रदेशों से महाराणा की सेवा  मे आये थे, उनमें डोडिया वंश सबसे प्राचीन राजवंश था । 🌱डोडिया वंश की उत्पत्ति🌱 एक प्राचीन मान्यतानुसार परशुराम द्वारा क्षत्रिय जाति का समूल नाश किये जाने के पश्चात पृथ्वी पर कोई वीर जाति शेष नहीं रही, जो वैदिक धर्म की रक्षा कर सके । चिन्तित ऋषि मुनियों ने क्षत्रिय वर्ण की पुर्नस्थापना के लिये एकत्रित होकर यज्ञ का आयोजन किया । तदनुसार शांडिल्य ऋषि ने यज्ञवेदी के चारो ओर कदली-स्तम्भ रोपकर यज्ञ सम्पूर्ण किया । इस प्रकार रोपे गये कदलीवृक्ष के डोडे (पुष्प)से एक साहसी वीर क्षत्रिय ...

Sanwar fort

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sanwarfort  यह मेवाड़ का द्वित्य श्रेणी थिकाना है, और यह तीसरी श्रेणी के ठिकानों का पाटवी थिकाना भी है। उनके पास 'बाबा (महाराज)' की उपाधि है। खेराबाद के बाबा संग्राम सिंह के छोटे बेटे, कुंवर शंभू सिंह, को यह ठिकाना प्राप्त हुआ।  इस ठिकाने के ठाकुर, मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह द्वितीय (उदयपुर के संस्थापक), उनके तीसरे पुत्र बाबा वीरमदेव के वंशज है। यह थिकाना बाबा राणावत थिकाना है| This is a second class thikana of Mewar, and it is the Patwi thikana (elder house) of the third class thikanas of Kankarwa, Pahuna, Jaiwana, Turkiya etc. These thikanas belonged to the descendents of Maharaj Shri Viramdev (Viramdeo), the younger brother of Maharaj Shri Sagat (Shakta) Singh, head of the Shaktawat clan and half brother of Maharana Pratap Singh of Mewar. They are known as Veeramdeot Ranawats, and have the title of 'Baba (Maharaj)'. The younger son of Baba Sangram Singh of Kherabad, Kunwar Shambhu Singh, received the thikana of Sanwar. Veeramdeots have the pri...

बड़ी सादड़ी

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एक वंश जिसने मेवाड़ राज्य के वृक्ष को अपने प्राणों से सींचा मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मेवाड़ राज्य को हिंदुस्तान में सबसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। इसे हिंदुआ सूरज का दर्जा दिया गया। मेवाड़ के सूर्यवंशी राजाओ का बड़ा गौरवशाली इतिहास रहा है, लेकिन मेवाड़ी गौरव के पीछे उसके राष्ट्रभक्त सरदारों, राव-उमरावों, ठिकानेदार योद्धाओं का प्रमुख योगदान रहा है। मेवाड़ी आन बान शान के पीछे उन बहादुरों का प्राणोत्सर्ग है, जिनकी पीढ़ी दर पीढ़ी मेवाड़ के लिए कुर्बान होती रही। ऐसा ही मेवाड़ का एक ठिकाना है बड़ी सादड़ी जिसकी सात पीढ़ियों अज्जा, सिंहा, आसा,सुरताण, झाला मान, देदा,हरिदास ने निरंतर मेवाड़ के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।जिसमे राणा सांगा के बाबर के साथ हुवे खानवा के युद्ध मे राणा सांगा के घायल होने कारण झाला अज्जा द्वारा उनका स्थान लेकर राणा सांगा को सुरक्षित युद्ध के मैदान से बाहर निकाल कर सैन्य मनोबल बनाये रखते हुवे वीरगति प्राप्त करने तथा हल्दीघाटी के युद्ध मे झाला मान द्वारा महाराणा प्रताप की जगह लेकर युद्ध करते हुवे वीर गति प्राप्त करने की घटनाये तो भारतीय इतिहास...

पेथापुर (गुजरात)

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श्रीमान रावसाहेब ऑफ पेथापुर दांता भवानगढ संस्थान श्री दांता स्टेट  का संक्षिप्त परिचय।         रावसाहेब ठाकुर गुलाबसिंहजी परमार दांता स्टेट की एक ऐसी शख्सियत जो महान दांता राज्य के दो महान राजवीओ के शासन काल तक दांता स्टेट का हिस्सा बने रहे और अपने कर्तव्य का पालन करते रहे। श्री रावसाहब पेथापुर  श्री महाराणा साहेब हमीरसिंहजी से लेकर महाराणा भवानीसिंहजी के शाशनकाल तक दांता स्टेट के कस्टम सुपरिटेंडेंट के पदभार पर बिराजीत रहे और राज्यव्यवस्था का हिस्सा बने रहे ।सन 1921 के दांता राज्यपर भीलो द्वारा कि गई चढ़ाई के वक्त राओ साहेब गुलाबसिंहजी ने अपनी बहादुरी ओर कुशल क्षात्रतेज का परिचय दिया और भीलो को खदेड़ ने में भी  निर्णायक भूमिका अदा की । ईस तरह बहादुरी की मिशाल पेश कर अपने राज्य के प्रति अप्रतिम बहादुरी को देख बादमे सन 1936 में नेक नामदार महाराणा श्री भवानसिंहजी साहब ऑफ दांता द्वारा राजपुताना एजेंसी को श्रीमान ठाकुर गुलाबसिंहजी को रावसाहेब टाइटल के लिए मनोंनित किया गया ओर पेथापुर में जागीर प्रदान की गईं। अपने...