पेथापुर (गुजरात)

श्रीमान रावसाहेब ऑफ पेथापुर दांता भवानगढ संस्थान श्री दांता स्टेट  का संक्षिप्त परिचय।
 
      रावसाहेब ठाकुर गुलाबसिंहजी परमार दांता स्टेट की एक ऐसी शख्सियत जो महान दांता राज्य के दो महान राजवीओ के शासन काल तक दांता स्टेट का हिस्सा बने रहे और अपने कर्तव्य का पालन करते रहे। श्री रावसाहब पेथापुर  श्री महाराणा साहेब हमीरसिंहजी से लेकर महाराणा भवानीसिंहजी के शाशनकाल तक दांता स्टेट के कस्टम सुपरिटेंडेंट के पदभार पर बिराजीत रहे और राज्यव्यवस्था का हिस्सा बने रहे ।सन 1921 के दांता राज्यपर भीलो द्वारा कि गई चढ़ाई के वक्त राओ साहेब गुलाबसिंहजी ने अपनी बहादुरी ओर कुशल क्षात्रतेज का परिचय दिया और भीलो को खदेड़ ने में भी  निर्णायक भूमिका अदा की । ईस तरह बहादुरी की मिशाल पेश कर अपने राज्य के प्रति अप्रतिम बहादुरी को देख बादमे सन 1936 में नेक नामदार महाराणा श्री भवानसिंहजी साहब ऑफ दांता द्वारा राजपुताना एजेंसी को श्रीमान ठाकुर गुलाबसिंहजी को रावसाहेब टाइटल के लिए मनोंनित किया गया ओर पेथापुर में जागीर प्रदान की गईं। अपने जीवन काल मे राओ साहेब गुलाबसिंहजी ने दांता स्टेट के अंतर्गत कई मंदिर के जीर्णोद्धार करवाए थे और कई गरीब कन्याओं की शादियों के खर्च भी उठाए थे ।
            जब महारणाजी की गैर हाजरी में एकबार एक रोचक घटना घटी महारणाजी राज्यकाज के लिए बहार थे और महाराणीसा को शिकार करने की इच्छा हुई तब सबके मना करने के बाद भी महाराणीसा नही माने और शिकार के लिए सब को तैयार किया उसवक्त राओसाहेब गुलाबसिंहजी भी साथ मौजूद थे महाराणीसा को शिकार मांचे(मचान) पर बिठाकर सब लोग शिकार की प्रतिक्षा में थे तभी एक तेंदुआ वँहा दिखा ओर महाराणीसा ने निशाना लगाया तेंदुए को गोली छू के निकल गई जिससे गुस्साए तेंदुए ने महारानीजी जँहा बैठी थी उस मांचे या मचान पर हमला किया तो मांचे (मचान)के टूट जाने से महारानीसा नीचे गिर गई जैसे ही तेंदुआ महारानीसा पर हमला करता बीच मे बुड्ढे अवस्था होने के बावजूद राओ साहेब गुलाबसिंहजी तेंदुए से भिड़ गए कहते है कि उन्होंने तेंदुए की जीभ को मरोड़कर बन्दूक के पिछले हिस्से से ही तेंदुए के शिर पर जोरदार प्रहार कर उसे मार दिया था। इस घटना में उनका हाथ बुरी तरह घायल हुआ था।महाराणा साहेब भवानीसिंहजी खुद इस घटना से बहोत ही प्रसन्न हुए थे और भरे दरबार में राओ साहेब का बहुमान किया था।
      रावसाहेब गुलाबसिंहजी का स्वभाव जितना तेज था उतना ही दयावान भी था राजस्थान में अकाल की स्थिति गम्भीर हुई थी उस वक्त दांता दरबार का सख्त फरमान था कि किसीभी राजस्थान के मवेशियों/रबारियों का प्रवेश दांता राज्य में वर्जित था उस वखत राओ साहेब ने अपनी निजी जमीन पर राजस्थान से आये कुच्छ रबारियों को अपने मवेशियों के साथ शरण दी थी बादमे उन्ही रबारियों के कहने पर अपनी जमीन पर रबारियों के आराध्य शूरवीर क्षत्रिय वीर दलजी गोंगजी धोणारी वीर मामाजी एवं चामुंडा माताजी का स्थानक बनाने की अनुमति दी जो आज बड़ा मन्दिर बन चुका है कई लोगो का आस्था का केंद्र है।
         श्री रावसाहेब ठाकुर गुलाबसिंहजी पर युवानी काल मे भक्ति का बड़ा प्रभाव था एक दौर उन्होंने युवानि समय में सन्यासी होने का निर्णय लिया और अपनी घोड़ी पर बैठ निकल पड़े अभी अर्जुनी नदी के पानी मे घोड़े के पैर पड़े ही थे के पीछे से एक प्रभावशाली आवाज आई "रुको ठाकर " वह कोई ओर नही पर पेथापुर के आराध्य गुरु डुंगरपुरीजी थे उन्होंने कहा कि आपका जन्म सन्यासी बनने के लिए नही हुआ वापस घर लौट जाओ और आज तुम्हारे घर जो सगाई (रिश्ता)हेतु कोई आये तो उसे स्वीकार करलेना ओर तुम्हारी प्रथम संतान होगी उसके दोंनो कानो में छेद होगा उसका नाम नाथूसिंह रखना और अद्रश्य हो गये फिर ऐसा ही हुआ जैसे ही गुलाबसिंहजी वापस घर लौटे तो गाँव के ही वाघेला सरदार गुमानसिंहजी अपनी कुँवरि गुलाबकुंवर का रिश्ता लेकर आये थे तो परिवारजनों को गुलाबसिंहजी ने उपरोक्त घटना बताई और रिश्ता स्वीकार किया और बाघेलीजी गुलाबकुंवर के संग गुलाबसिंहजी का विवाह हुआ संयोग से दोनों का नामभी एकही था । गुलाबकुंवर भी बहोत ही दयावान और पतिव्रता थे जिनके पहली संतान गुरुमहाराज के कहे अनुसार पुत्र हुआ जिसके जन्मसे ही कानों में छेद थे जिनका नाम नाथूसिंहजी रक्खा गया बादमे तीन पुत्रियां हुई जिनके बाद रायसिंहजी,खुमानसिंहजी हुए ।तीनो भाइयों का ब्याह महाराणा भवानीसिंहजी ओर पेथापुर गांधीनगर ठाकुर साहब फतेसिंहजी वाघेला ने तय किया था अपने भाइपे खुशालसिंहजी परिवार की कुँवरि बाघेलीजी पेथापुर वाले के साथ ओर एक पुत्रि दांता स्टेट के प्रधान श्री नहारसिंहजी चावडा (सैकड़ा ठाकुर साहब)के साथ ब्याही गई थी(पहले गुलाबसिंहजी अपनी कुँवरि का रिश्ता प्रधानजी के साथ करने के लिए राजी नही थे बादमे महाराज साहब महोब्बतसिंहजी (पोता बावजी)के हठाग्रह से यह रिश्ता तय हुआथा)बादमे ओर दो पुत्रियों का विवाह भी दांता प्रधान परिवार में ही हुआ था ओर सभी भांजियों का रिश्ता भी हराद ठाकुर साहब राठौड़ दांता स्टेट का प्रमुख ठिकाना (हराद ठाकुर साहब को सोनेकी बेड़ी दांता स्टेट से पहनाई जाती थी) एवं अडेरन दांतापरिवार में किया गया।। 
      एक ही परिवार के पिता एवं तीनो पुत्र भी दांता स्टेट के सभी उच्चपदों पर आशित थे महाराणा हमीरसिंहजी से महाराणा भवानीसिंहजी के समय तक श्री रावसाहेब  गुलाबसिंहजी कस्टम सुपरिटेंडेंट रहे बादमे उनके तीनो पुत्र श्रीमान ठाकुर नाथूसिंहजी परमार अंबाजी महाल के महालकारी एवं मैजिस्ट्रेट के तौर पर स्टेट मर्ज तक इस पद पर विराजमान रहे,श्री ठाकुर रायसिंहजी स्टेट के खास विभाग सरभरा सुपरिटेंडेंट के तौर पर कायम रहे।सबसे छोटे भाई खुमानसिंहजी भी पुलिस इंस्पेक्टर दांता स्टेट के तौर पर विराजित रहे थे।
     दांता स्टेट परिवार से श्री रावसाहेब परिवार को सदा सन्मान मिला है और आज भी मिलता है ।मेरी जानकारी अनुसार महाराणा साहब हमीरसिंहजी से लेकर महाराणा साहब भवानीसिंहजी, महाराणा साहब पृथ्वीराजसिंहजी ने कभी इस परिवार की अवहेलना नही की आखिरी दौर में जब नाथूसिंहजी बीमार पड़ते थे तब महाराणा पृथ्वीराजसिंहजी को समाचार मिलते ही तुरंत डाईवर के साथ गाड़ी भेजते थे पर नाथूसिंहजी खुद्दारी के चलते गाड़ी यह कहकर वापस भिजवा देते थे कि अभी मेरे पैर सलामत है। इसबात का महाराणाजी कभी बुरा नही मानते थे।पर कई पीढ़ियों से एक ही परिवार से लगाव होने के कारण ओर स्टेट के सभी उच्चपदों पर एकहि परिवार के शासन के चलते कई बार स्टेट के दूसरे  ईर्ष्या वादी सरदारोंका पेथापुर रावसाहब परिवार पर ईर्ष्या वश सदैव धृणा का भाव रहता था पर मा जगदम्बा कृपा से आज पर्यंत इसका इस परिवार पर कोई दुष्प्रभाव नही पड़ शका।

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Maharaj Saheb Paramvirsinghji Parmar

✍️Jaypalsingh Parmar

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