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सितंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Sanwar fort

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sanwarfort  यह मेवाड़ का द्वित्य श्रेणी थिकाना है, और यह तीसरी श्रेणी के ठिकानों का पाटवी थिकाना भी है। उनके पास 'बाबा (महाराज)' की उपाधि है। खेराबाद के बाबा संग्राम सिंह के छोटे बेटे, कुंवर शंभू सिंह, को यह ठिकाना प्राप्त हुआ।  इस ठिकाने के ठाकुर, मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह द्वितीय (उदयपुर के संस्थापक), उनके तीसरे पुत्र बाबा वीरमदेव के वंशज है। यह थिकाना बाबा राणावत थिकाना है| This is a second class thikana of Mewar, and it is the Patwi thikana (elder house) of the third class thikanas of Kankarwa, Pahuna, Jaiwana, Turkiya etc. These thikanas belonged to the descendents of Maharaj Shri Viramdev (Viramdeo), the younger brother of Maharaj Shri Sagat (Shakta) Singh, head of the Shaktawat clan and half brother of Maharana Pratap Singh of Mewar. They are known as Veeramdeot Ranawats, and have the title of 'Baba (Maharaj)'. The younger son of Baba Sangram Singh of Kherabad, Kunwar Shambhu Singh, received the thikana of Sanwar. Veeramdeots have the pri...

बड़ी सादड़ी

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एक वंश जिसने मेवाड़ राज्य के वृक्ष को अपने प्राणों से सींचा मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मेवाड़ राज्य को हिंदुस्तान में सबसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। इसे हिंदुआ सूरज का दर्जा दिया गया। मेवाड़ के सूर्यवंशी राजाओ का बड़ा गौरवशाली इतिहास रहा है, लेकिन मेवाड़ी गौरव के पीछे उसके राष्ट्रभक्त सरदारों, राव-उमरावों, ठिकानेदार योद्धाओं का प्रमुख योगदान रहा है। मेवाड़ी आन बान शान के पीछे उन बहादुरों का प्राणोत्सर्ग है, जिनकी पीढ़ी दर पीढ़ी मेवाड़ के लिए कुर्बान होती रही। ऐसा ही मेवाड़ का एक ठिकाना है बड़ी सादड़ी जिसकी सात पीढ़ियों अज्जा, सिंहा, आसा,सुरताण, झाला मान, देदा,हरिदास ने निरंतर मेवाड़ के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।जिसमे राणा सांगा के बाबर के साथ हुवे खानवा के युद्ध मे राणा सांगा के घायल होने कारण झाला अज्जा द्वारा उनका स्थान लेकर राणा सांगा को सुरक्षित युद्ध के मैदान से बाहर निकाल कर सैन्य मनोबल बनाये रखते हुवे वीरगति प्राप्त करने तथा हल्दीघाटी के युद्ध मे झाला मान द्वारा महाराणा प्रताप की जगह लेकर युद्ध करते हुवे वीर गति प्राप्त करने की घटनाये तो भारतीय इतिहास...

पेथापुर (गुजरात)

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श्रीमान रावसाहेब ऑफ पेथापुर दांता भवानगढ संस्थान श्री दांता स्टेट  का संक्षिप्त परिचय।         रावसाहेब ठाकुर गुलाबसिंहजी परमार दांता स्टेट की एक ऐसी शख्सियत जो महान दांता राज्य के दो महान राजवीओ के शासन काल तक दांता स्टेट का हिस्सा बने रहे और अपने कर्तव्य का पालन करते रहे। श्री रावसाहब पेथापुर  श्री महाराणा साहेब हमीरसिंहजी से लेकर महाराणा भवानीसिंहजी के शाशनकाल तक दांता स्टेट के कस्टम सुपरिटेंडेंट के पदभार पर बिराजीत रहे और राज्यव्यवस्था का हिस्सा बने रहे ।सन 1921 के दांता राज्यपर भीलो द्वारा कि गई चढ़ाई के वक्त राओ साहेब गुलाबसिंहजी ने अपनी बहादुरी ओर कुशल क्षात्रतेज का परिचय दिया और भीलो को खदेड़ ने में भी  निर्णायक भूमिका अदा की । ईस तरह बहादुरी की मिशाल पेश कर अपने राज्य के प्रति अप्रतिम बहादुरी को देख बादमे सन 1936 में नेक नामदार महाराणा श्री भवानसिंहजी साहब ऑफ दांता द्वारा राजपुताना एजेंसी को श्रीमान ठाकुर गुलाबसिंहजी को रावसाहेब टाइटल के लिए मनोंनित किया गया ओर पेथापुर में जागीर प्रदान की गईं। अपने...

ठिकाना - उनियारा किल्ला (टोंक)

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उनियारा .तहसील क्षेत्र के ककोड ग्राम मेंं जर्जर किला देखरेख के अभाव में खंडहर होता ककोड़ किला    ककोड में ऐतिहासिक किला जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलो में से एक होने के बावजूद खंडहर होता जा रहा है। अरावली पर्वत श्रृंखला की 200 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह किला बेजोड़ स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्घ है।  वर्तमान में इस प्राचीन किले के अंदर 60 कमरे जीर्ण शीर्ण हालात में मौजूद हैं। किले के अंदर ही दो प्राचीन कुंड भी है तथा तारा हाडी नामक दो बावड़ियां भी है तारा बावड़ी में 9 ढाणे हैं , जिससे इसे 9 ढाणों की बावड़ी भी कहते हैं। किले के अंदर एक गणेश मंदिर भी है , जो प्राचीन समय में ही यहां के शासकों के आराध्य देव के रूप में पूजनीय थे। मंदिर किले के जीर्ण शीर्ण होने के बाद भी गणेश प्रतिमा सुरक्षित थी, मगर कुछ वर्ष पूर्व असामाजिक तत्वों ने इस प्रतिमा केा खंडित कर दिया , जिसके बाद उनियारा के पूर्व दरबार राव राजा राजेन्द्र सिंह ने पुन: गणेश प्रतिमा की स्थापना की हालांकि अधिकतर सुरंगें मिट्टी से भर गई हैं। कहा जाता है कि उस जमाने में इन सुरंगों का उपयोग शत्रु के आक्...

● साफा और मारवाड़ के राठौड़ ●

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राव सीहा के पुत्र राव आस्थान ने गोहिलों व डाभी राजपूतों को हराकर खेड़ जीत लिया और कालान्तर में जब उसके प्रपौत्र राव कनपाल(१३१३-१३२३ई.) के समय महेवे का सारा भू-भाग राठौड़ों के अधिकार में आ गया। तब से राठौड़ों की सीमा जैसलमेर को छूने लगी। जिससे भाटियों-राठौड़ों के बीच समय-समय पर झगड़े होने लगे। तब कनपाल के ज्येष्ठ पुत्र भीम ने भाटियों को हराकर काक नदी से पश्चिम की ओर धकेल दिया। तब से दोनों की सरहद नियत हो गई। जिसका ये सोरठा प्रसिद्ध है-  आधी धरती भीम, आधी लोदरवै धणी।  काक नदी छै सीम, राठौड़ां ने भाटियाँ।।  [आधी धरती भीम की और आधी धरती लौद्रवै के शासकों(भाटियों) की है, काक नदी भाटियों व राठौडों के राज्य की सीमा रेखा है] चूँकि ये सीमा महेवे के शासकों ने बलपूर्वक तय की थी, अत: भाटियों ने इसे नहीं माना और वे राठौड़ों के विरूद्ध मुल्तान के मुसलमानों व अमरकोट के सोढों को ले आए।  ई.1323 में इनके मध्य हुए युद्धों मे पहले भीम व बाद में राव कनपाल दोनों ही लड़कर काम आए और कनपाल का दूसरा पुत्र जालणसीं (१३२३-१३२७) अब महेवे का नया शासक बना। अमरकोट के सोढा भाटियों का साथ ...

भटनेर दुर्ग

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BHATI RAJPUT🚩 ⚔️भटनेर दुर्ग ⚔️ :- यह गढ़ आज भी भाटी शासकों की वीरता, युद्ध कुशलता, स्थापत्य ज्ञान, प्रजा वात्सलता ओर शौर्य की कहानियां अपने हृदय में समेटे घग्घर नदी के मैदान पर शान से खड़ा है। इसने जूंझारो को जूंझते, सतियो को ज्वालाओं में स्वयं समर्पित होते तथा वीरों को अपने धर्म व राष्ट्र की मान मर्यादा की रक्षार्थ आत्मोत्सर्ग करते देखा है। तैमूर लंग ने अपनी पुस्तक "तुजुक ए तैमूरी में इस किले के लिए लिखा है- मैने इतना मजबूत व सुरक्षित किला पूरे हिंदुस्तान में नहीं देखा . राजा भाटी के पुत्र राजा राजा भूपत ने तीसरी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 286 ईस्वी में यह किला बनवाया। 1) गजनी के शासक राजा गज्जू भाटी के समय यहां प्रथम शाका हुआ| इसका समय 479 ईसवी माना  जाता है| यह भाटियों का दूसरा साका था| 2) 1001 ईस्वी में इस पर प्रथम मुस्लिम आक्रमण महमूद गजनवी ने किया| 3) 1398 ईसवी में तैमूरलंग ने आक्रमण किया, यह आक्रमण भाटी शासक राव दुलिचन्द जी के समय हुआ| इस समय  साका हुआ| यहां हिंदू महिलाओं के साथ मुस्लिम महिलाओं के जोहर का साक्ष्य भी मिलता है| 4)1534 ईसवी में हुमायूं के भाई ...

कुचामन किला : जागीरी किलों का सिरमौर

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जिस पर्वतांचल में कुचामन बसा है, जहाँ पूर्व में कुचबंधियों की ढाणी थी। अनुमान है कि उसी के आधार पर यह कस्बा कुचामन कहलाया। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि इस कस्बे पर प्राचीन समय में गौड़ क्षत्रियों का वर्चस्वथा जिसकी प्रमाण कुचामन के आस-पास के क्षेत्रों मिठडी, लिचाणा एवं नावां क्षेत्र में मिलते हैं। उस काल में मारोठ इसकी राजधानी थी जो कि एक प्राचीन नगर है। इतिहास इसका प्रमाण देता है कि मुगल बादशाह शाहजहाँ के काल तक गौड़ों का प्रकर्ष था। कुचामन सिटी नागौर जिले का एक ऐतिहासिक कस्बा है। यह जयपुर- ७ जोधपुर रेल मार्ग पर नावां और मकराना के मध्य में एक छोटा रेलवे स्टेशन है। मुख्य कस्बा इस स्टेशन से लगभग 10 कि.मी. पर अवस्थित है। कुचामन पूर्व जोधपुर रियासत में मेड़तिया राठौडों का एक प्रमुख ठिकाना था, जो न केवल अपने शासकों की वीरता और स्वामीभक्ति एवं बलिदान की घटनाओं के लिए विख्यात है, अपित अपने भव्य और सुदृढ़ दुर्ग के लिये भी प्रसिद्ध है। कुचामन का किला रियासतों के किलों से टक्कर लेता है, इसलिए यदि कुचामन के किले को जागीरी किलों का सिरमौर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इसके सम्बन्ध में एक लोकोक्ति कह...

ठिकाना राजपूताना

जय माताजी होकम सा  Fortinindia का उद्देश्य ऐतिहासिक धरोहरों को भारत के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुचाना है, भारत के कण कण की गौरवशाली ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करने का एक छोटा सा प्रयास है।